ध्यान
छठम दिनः
पद 7 आ 8
Jita Prasantasya Paramatma Samadhya: जीतोस्तास्कुधदुकेशु आणि मानापमानायों । 6 - 7. ज्यानविज्यनातास्तास्तात्तमा कुतस्तो विजितेन्द्रिया: युक्ता योगी समालोश्ताश्मकान्चाना: योगी समालोश्ताश्यकानाना: योगी समालोश्ताश्यकानाना: योगी समालोश्ताश्यकानाना: योजी समामालोश्तास्य कान्यान्या: योजिताय
अनुवाद
.. 6. जे आत्मा शीत आ गर्मीमे, सुख आ पीड़ा मे, आ अपमान मे शान्ति मे रहैत अछि, ओकर लेल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान उचित रूप सँ स्थित छथि, अर्थात स्व-अस्तित्व मे छथि। 8. एकटा योगी जे ज्ञान आ विज्ञान सँ संतुष्ट अछि, जे अव्यवस्था (कुटस्थ) सँ रहित अछि आ जितेन्द्रिया अछि, जे मिट्टी, पत्थर आ कांस्य जकाँ अछि, ओकरा (परमात्मासँ) सम्पन्न कहल जाइत अछि।
पद 11 आ 12
नाट्टुचिट्टा नाटिनिचा चलजिनकुशोत्तरम। 6-11। यतचित्तेन्द्रियाक्रियः। उपविश्यासना युनज्योद्योगमात्मविशुद्धिये। 6-12
अनुवाद
.. 6. 11. शुद्ध (स्वच्छ) जमीन पर कुश, चिड़ियाघर आ कपड़ाक संग अपन सीट न बहुत ऊँच आ न बहुत नीचा राखि कऽ.... 2. 62। ओतऽ (आसनमे बसि) मनकेँ एकाग्र करू, मन आ इन्द्रियाक क्रियाकेँ नियन्त्रित कऽ आत्मशुद्धिक लेल योगक अभ्यास करू।
पद 13 आ 14
विषुव स्थिर अछिः रिफ्लेक्सिव नासिका अपन दिस इशारा करैत अछि।। शान्त आत्मा अतीतमे स्थित अछि, ब्रह्मा रथमे।
अनुवाद
.. 2. 23। शरीर, माथ आ गर्भाशय ग्रीवाक समान आ स्थिर धारण करैत, अपन नासिका छिद्रक अग्र भागकेँ बिना दोसर दिशामे देखैत अछि.... 2. 24। (साधक) केँ शान्त विवेक, निडर आ ब्रह्मचारीमे बेसबाक चाही, मनकेँ नियन्त्रित करबाक चाही, मनकेँ हमरा पर लागू करबाक चाही आ हमरा अंतिम लक्ष्यक रूपमे सोचबाक चाही।
पद 20,21,22,23
जतऽ मन योगमे लागल रहैत अछि, मन योगमे लागल रहैत अछि। जतऽ आत्माक सम्बन्ध अछि, मन योगमे तल्लीन रहैत अछि। जतऽ मन योगमे लागल रहैत अछि, ओतऽ मन योगमे लागल रहैत अछि।
अनुवाद
.. 2. 2। योगक अभ्याससँ जाहि अवस्थामे अनियंत्रित मन ऊपर उठाइत अछि आ जाहि अवस्थामे आत्मा स्वयंसँ सन्तुष्ट होइत अछि, स्वयंकेँ स्वयंमे देखैत अछि...। 6. 21. जे सुख परम, दिव्य आ बुद्धिमान अछि, जाहि अवस्थामे व्यक्ति ओहि सुखक अनुभव करैत अछि आ जाहि सुखमे व्यक्ति अवस्थित अछि, ई ध्यानी फेर कहियो सारसँ विचलित नहि होइत अछि। 6. 22. ओ जे प्राप्त होइत अछि ओकर अतिरिक्त कोनो आन लाभमे विश्वास नहि करैत अछि, आ जखन ओ ओहिमे रहैत अछि तखन ओ पैघ दुःखसँ विचलित नहि होइत अछि। 6. 23. दुखक संयोगसँ एकटा बिदाई होइत छैक, जकरा 'योग' क नामसँ जानल जाय। ओहि ध्यान (ओ योग जे ध्यान योगक लक्ष्य अछि) क अभ्यास अटल दिमागसँ करबाक चाही।
श्लोक 24 आ 25
सङ्कल्प प्रभावंकामे, अन्तमे,।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
अनुवाद
.. 6. 24. इच्छा सँ उत्पन्न सभ इच्छा के पूर्ण तरीका सँ दूर कऽ आर हर तरह सँ मन के माध्यम सँ इन्द्रिय के अधीन कऽ कऽ..... 6. 25. धीरे-धीरे रोगी बुद्धि के माध्यम सँ (योगी) उपरामता (शांति) प्राप्त करैत छथि। मनकेँ आत्मामे स्थिर कय ओ किछु आओर नहि सोचैत अछि।
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