ध्यान - श्लोक श्लोक 28

ध्यान

श्लोक 28

युन्जन्नेवम सद्भावना योगी विचित्रकलमासाहः। सुखेन ब्रह्मसम्परिमत्यंत सुखमश्नुते।। 6-28।

अनुवाद

.. 2. 28। एहि तरहेँ, पापरहित योगी, जे सदैव मनकेँ आत्मामे स्थिर करबाक योगक अभ्यास करैत छथि, प्रसन्नतासँ ब्रह्मसम्पारक सर्वोच्च आनन्द प्राप्त करैत छथि।

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