ध्यान - श्लोक पद 5

ध्यान

पद 5

उधरेयादत्मानत्मानत्मानमवासदाते। आत्मायवत्मानो अम्मानो बन्दुरत्मानो पुनः मन्थन। 6-5।

अनुवाद

.. 6. 5. मनुष्य केँ अपना केँ बचयबाक चाही आ अपन पतन नहि करबाक चाही। किएक तँ आत्मा आत्माक मित्र छथि, आ आत्मा (स्वयं मनुष्य) आत्माक शत्रु छथि।

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