ध्यान - श्लोक पद 7 आ 8

ध्यान

पद 7 आ 8

Jita Prasantasya Paramatma Samadhya: जीतोस्तास्कुधदुकेशु आणि मानापमानायों । 6 - 7. ज्यानविज्यनातास्तास्तात्तमा कुतस्तो विजितेन्द्रिया: युक्ता योगी समालोश्ताश्मकान्चाना: योगी समालोश्ताश्यकानाना: योगी समालोश्ताश्यकानाना: योगी समालोश्ताश्यकानाना: योजी समामालोश्तास्य कान्यान्या: योजिताय

अनुवाद

.. 6. जे आत्मा शीत आ गर्मीमे, सुख आ पीड़ा मे, आ अपमान मे शान्ति मे रहैत अछि, ओकर लेल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान उचित रूप सँ स्थित छथि, अर्थात स्व-अस्तित्व मे छथि। 8. एकटा योगी जे ज्ञान आ विज्ञान सँ संतुष्ट अछि, जे अव्यवस्था (कुटस्थ) सँ रहित अछि आ जितेन्द्रिया अछि, जे मिट्टी, पत्थर आ कांस्य जकाँ अछि, ओकरा (परमात्मासँ) सम्पन्न कहल जाइत अछि।

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