ध्यान - श्लोक पद 1

ध्यान

पद 1

श्रीभगवानुवनाचार्यह। अनाश्रीताः कर्म-फलकार्मकराय। श्यासिनासीचयोगीनिनिनिराग्निर्नाचक्रियाहा। 6-1।

श्रीभगवानुवाच

अनुवाद

.. 6. 1। श्रीभगवन कहलनि, "जे व्यक्ति कर्मपाल पर निर्भर होय बिना अपन कर्तव्यक पालन करैत अछि, ओ संन्यासी आ योगी अछि, ओ नहि जे अग्नि आ क्रियाकेँ त्याग देने अछि।"

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