ध्यान - श्लोक पद 2

ध्यान

पद 2

सन्यासी एकटा योगी होइत छथि जे योगी नहि छथि।

अनुवाद

.. 2. 2। ओ पाण्डव! जकरा (शास्त्र) संन्यास कहैत छथि, ओही अहाँ योग मानैत छी। किएक तँ एहन कोनो पुरुष योगी नहि अछि जे अपन प्रतिज्ञाक त्याग नहि करैत हो।

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