ध्यान - श्लोक पद 20,21,22,23

ध्यान

पद 20,21,22,23

जतऽ मन योगमे लागल रहैत अछि, मन योगमे लागल रहैत अछि। जतऽ आत्माक सम्बन्ध अछि, मन योगमे तल्लीन रहैत अछि। जतऽ मन योगमे लागल रहैत अछि, ओतऽ मन योगमे लागल रहैत अछि।

अनुवाद

.. 2. 2। योगक अभ्याससँ जाहि अवस्थामे अनियंत्रित मन ऊपर उठाइत अछि आ जाहि अवस्थामे आत्मा स्वयंसँ सन्तुष्ट होइत अछि, स्वयंकेँ स्वयंमे देखैत अछि...। 6. 21. जे सुख परम, दिव्य आ बुद्धिमान अछि, जाहि अवस्थामे व्यक्ति ओहि सुखक अनुभव करैत अछि आ जाहि सुखमे व्यक्ति अवस्थित अछि, ई ध्यानी फेर कहियो सारसँ विचलित नहि होइत अछि। 6. 22. ओ जे प्राप्त होइत अछि ओकर अतिरिक्त कोनो आन लाभमे विश्वास नहि करैत अछि, आ जखन ओ ओहिमे रहैत अछि तखन ओ पैघ दुःखसँ विचलित नहि होइत अछि। 6. 23. दुखक संयोगसँ एकटा बिदाई होइत छैक, जकरा 'योग' क नामसँ जानल जाय। ओहि ध्यान (ओ योग जे ध्यान योगक लक्ष्य अछि) क अभ्यास अटल दिमागसँ करबाक चाही।

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