ज्ञानकर्मस्योग
चौथा दिनः
पद 16
कर्म की कर्मिकर्मेती काव्यो पहुमन्त्र मोहिताः तत्ते कर्म भविष्यवाणी यज्ञत्व मोक्ष से सुभता।। 4-16।
अनुवाद
.. 4. 16. कर्म की छै आ अकर्म की छै? बुद्धिमान पुरुष सेहो एहि मामिलामे भ्रमित भऽ जाइत छथि। तेँ हम अहाँकेँ कर्म (अर्थात् कर्म आ कर्मक प्रकृति) कहैत छी, ई जानि कऽ जे अहाँ संसार (सांसारिक बन्धन) सँ मुक्त रहब।
श्लोक 23
घट-सांग्य-मुक्तस्य-सत्व-ज्ञान-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व-सत्व।
अनुवाद
.. 4. 23. जे असम्बद्ध आ स्वतन्त्र अछि, जकर मन ज्ञानमे स्थित अछि, त्यागक लेल काज करैवला एहन व्यक्तिक सभ काज समाहित भऽ जाइत अछि।
श्लोक 24
ब्रह्मर्पनम् ब्रह्म हवीर ब्रह्मग्नौ ब्राह्मण कुटीम। ब्रह्मैव दस गन्तव्यम ब्रह्मकर्मसमधिना। 4-24।
अनुवाद
.. 4. 24. अर्पन (अर्थात प्रसादक साधन) ब्राह्मण अछि आ हवी (शाकल्य वा हवन करबा मे सक्षम तरल पदार्थ) सेहो ब्राह्मण अछि। ब्रह्म-रूप अग्निमे ब्रह्म-निर्माणकर्ता द्वारा कयल गेल हवन सेहो ब्रह्म अछि। एहि तरहेँ ब्रह्म रूप कर्ममे समाधिमे मनुष्यक गंतव्य सेहो ब्रह्म अछि।
श्लोक 33
श्रेयंद्रमयाद्याद्याज्याज्याज्याजनाज्याजनाज्याजनाज्याजनाज्याज्याजनाज्याजनाज्याज्याजनाज्याज्याजनाज्याजियाजनाज्याज्याजनाज्याज्याजनाज्याजनाज्याजनाज्याजियाजनाज्याजनाज्याद्याज्याज्याद्याज्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याज्याज्याज्याजनाजियाजनाजियाजनाज
अनुवाद
.. 4. 33. ओ प्यारी! ज्ञान यज्ञ तरल पदार्थसँ सम्पन्न कयल जायवला यज्ञसँ श्रेष्ठ अछि। ओ प्यारी! सभ कर्म ज्ञानमे समाप्त होइत अछि, अर्थात् ज्ञान ओकर पराकाष्ठा अछि।
श्लोक 39
श्रद्धावाल्वाल्भते ज्यान त्रतार: संयतेन्द्रिया: संयतेन्द्रिया । शान्तिमिचिरेना दिया पर ज्याना दियाता में शांतिमिचिरेना दिया । 4-39.
अनुवाद
.. 4. 39. जे व्यक्ति श्रद्धाशील, तैयार आ ज्ञानसँ भरल रहैत अछि, ओ ज्ञान प्राप्त करैत अछि। ज्ञान प्राप्त करबासँ शीघ्रहि परम शान्ति प्राप्त होइत अछि।
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