अक्षर ब्रह्मयोग
अथ अष्टपति
पद 1
अर्जुन, उवाचन। की ता ब्रह्म, की मध्यात्मा, की कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतम्, की प्रकृतमधैव की महामंत्र। 8-1।
अनुवाद
.. 8. 1। अर्जुन कहलकनि, "हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान! ओ ब्रह्म की छै, आध्यात्मिकता की छै? आ कर्म की अछि? आ उत्कृष्ट नामसँ की कहल जाइत अछि? आ जकरा दत्तारेवक नाम सँ जानल जाइत अछि,
पद 3
श्रीभगवानूचचा। अक्षरम ब्रह्म परममम परम्परा अमाध्यमातामातामातामातामातामातामाताम। भूत भाइत्यवद्वकरो विसर्गः कर्मसंगिता। 8-3।
अनुवाद
.. 8. 3। श्रीभगवन कहैत छथि, "सर्वोच्च अक्षर (अविनाशी) तत्व ब्रह्म अछि। प्रकृति (अपन रूप) केँ अध्यात्म कहल जाइत अछि। जे विसर्जन (त्याग, प्रेरक शक्ति) भूतक भावना उत्पन्न करैत अछि ओकरा कर्म कहल जाइत अछि। "
पद 9 आ 10
कवि पुराणमुष्यन्तर-मनोरण्यमस्मानुस्मरेद्यः। सर्वस्य धतरामचिन्तिरूप-मडियवर्नम तमसा-परस्तत।। 8-9। योगबल्लेना शैव यात्रा करैत काल मन के धर्मनिष्ठा के संग।। कपाल मे प्राणमवेश्य सर्ग्या।। पुरुषम्पुप्ति दिव्यम।। 8-10
अनुवाद
.. 8. 9. ओ जे सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सभसँ नियंत्रक, सभसँ सूक्ष्मतम, सभसँ धाता, अकल्पनीय रूप, सूर्य सदृश प्रकाश रूप, आ (अविद्या) अन्धकारसँ परे तत्वकेँ स्मरण करैत अछि। 8. 10. ओ (साधक) भक्तिसँ भरल स्थिर मस्तिष्कक सङ्ग हृदयक मध्यमे प्राणकेँ ठीकसँ राखि अन्तिम समयमे योगक शक्तिसँ परम दिव्य व्यक्तिकेँ प्राप्त करैत छथि।
पद 11
यदाक्षरम वेदविद्यासभ कहैत छथि विषान्ति या यो वीतरागः । यदि अहाँ ब्रह्मचर्यक अभ्यास करय चाहैत छी तऽ शब्द जमा करू।। 8-11
अनुवाद
.. 8. 11. जकरा वेदक विद्वान अक्षर कहैत छथि। जाहि मे बिना रागक प्रयासरत पुरुष प्रवेश करैत छथि; जकर इच्छासँ (साधक गण) ओ ब्रह्मचार्यक अभ्यास करैत छथि-ओ शब्द (लक्ष्य) हम अहाँकेँ संक्षेपमे बता देब।
पद 12 आ 13
सर्वद्वरणी सम्यमया मानसिक हृदय अनिरुद्धयानयन योगधरनम। 8-12। प्राणमासितो योगधरनम। 8-12। ब्रह्म व्यहरनमनुसुमा प्रार्थना त्याजन्देह सायती परमना गतिम। 8-13।
अनुवाद
.. 8. 12. (इन्द्रियाक) सभ द्वारकेँ संयमित कऽ, मनकेँ हृदयमे स्थिर कऽ, प्राणकेँ मस्तिष्कमे स्थापित कऽ, ओ योगिक मुद्रामे बसलाह। 8. 13. जे व्यक्ति शरीरक त्याग करैत अछि, ई एकटा शब्दांश ब्राह्मणक उच्चारण करैत अछि आ हमरा स्मरण करैत अछि, ओ सर्वोच्च गति प्राप्त करैत अछि।
पद 20
Parastasmatu bavamanymanymanyamanyamapravarthamanymanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyamanyam
अनुवाद
.. 8. 20. मुदा ओहि अव्यक्तक अतिरिक्त जे अनन्त अव्यक्त भाव अछि, ई तखन सेहो नष्ट नहि होइत अछि जखन सभ भूत नष्ट भऽ जाइत अछि।
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