अध्याय 16

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

अथ शोदाशो अलारी

24 खंड
दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 1,2 आ 3

श्रीभगवानूचाशा। अभयया सत्वस्थिरज्ञानयोग प्रणालीः। दानाददामासीयाजननासाश्वस्थप अर्जवम।। 16-1। अहिंसा सत्यमक्रद्धस्थ्यगगशांतिश्रीपासनम।। दया भूतेश्वलोलुप्तम मर्दवम हृद्रीचपालम।। 16-2

श्रीभगवानुवाच

अनुवाद

.. 16. 1. पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कहलनि, "अभय, हृदयक शुद्धि, ज्ञान योगमे दृढ़ता, दान, दमा, यज्ञ, स्वाध्याय, तप आ अर्जव"...। 16. 2. अहिंसा, सत्य, क्रोधक अभाव, त्याग, शान्ति, अपैष्णम (ककरो निन्दा नहि करब), भूतक प्रति दया, अनासक्ति, मर्दवा (कोमलता), लज्जा, अचञ्चलता...। 16. 3. हे भारत! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धिकरण), अद्रोह, आ अतिमान (गर्व) क अनुपस्थिति दिव्य धनसँ सम्पन्न व्यक्तिक लक्षण अछि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

श्लोक 4

दम्भो दर्पोह, अभिमान, आ क्रोधः परूष्यमवे च।

अनुवाद

.. 16. 4. ओ प्यारी! अहंकार, घमण्ड, क्रोध, कठोर वाणी (परूश्य) आ अज्ञान सभ राक्षसी सम्पत्ति अछि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 5

दैवी सम्पद्विमोक्षया निबन्धायसुरी मातम। माँ भावना सम्पदम देवी-मभिजाता अमन्सी पांडव। 16-5।

अनुवाद

.. 16. 5. ओ पाण्डव! दिव्य धन मोक्षक लेल होइत अछि आ राक्षसी धन बन्धनक लेल होइत अछि, शोक नहि करू, किएक तँ अहाँ दिव्य धनसँ सम्पन्न छी।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

श्लोक 6

दू टा भूत भगौड़क स्थान असुर आ च अछि। दिवो एक्सटेंडेडः पार्थमे प्रोक्टा असुर। 16-6।

अनुवाद

.. 16. 6. ओ प्यारी! एहि संसारमे दू प्रकारक भूत अछि, दिव्य आ राक्षसी। एहिमे देवताक (दिव्य धन) स्वरूपक विस्तारसँ वर्णन कयल गेल अछि। आब हमरा सँ असुरक प्रकृति के विस्तार सँ सुनू।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 7

एहि प्रवृत्तिमे सेवानिवृत्तिकेँ नहि जानब कोनो अधलाह विचार नहि अछि। शौचालयक आकार वा सत्य नहि जानि। 16-7

अनुवाद

.. 16. 7. आसुरी स्वभावक लोक न वृत्ति जानैत छथि आ न निवृत्ति। हुनका सभमे न पवित्रता अछि, न सद्गुण अछि, न सत्य अछि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

श्लोक 8

अश्यतम प्रतिष्ठा ते जगदहूरानीस्वरम। अप्रसम्प्रसम्भतम किमान्यातकमहायितुकम। 16-8।

अनुवाद

.. 16. 8. ओ सभ कहैत छथि जे ई संसार आश्रयहीन, असत्य आ भगवानसँ रहित अछि, जे एकर जन्म अन्तर-यौन सम्बन्ध (पुरुष आ महिलाक) सँ भेल अछि, आ एकर कारण की भऽ सकैत अछि?

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 9

एहि दृष्टिकोणसँ, एकटा नाशवान आत्मा होइत अछि, आ एकटा नाशवान आत्मा होइत अछि।

अनुवाद

.. 16. 9. एहि दृष्टिकेँ अपनाएलासँ नाशवान स्वभावक कम बुद्धिक लोक, जे अधलाह काज करैत छथि, ओ एकरा नष्ट करबाक लेल दुनियाक शत्रु (हानि खोजयवला) क रूपमे जन्म लैत छथि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 10

कामश्रीतापूश्रीमा मानानाडनवित। सीमित चेतनाप्रभतांतेसूचिव्रत।। 16-10।

अनुवाद

.. 16.10। अशुद्ध संकल्पक ई लोक संसारमे काज करैत छथि, अहङ्कार, सम्मान, आ गर्वसँ बनल कखनो पूरा नहि होबयवला इच्छाक शरण लैत छथि, आ मोहक मिथ्या धारणाकेँ अपनाबैत छथि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 11 आ 12

चिन्तामपरिमयमे प्रालयन्तमुपश्रीत। कामोपाभोगपरिमयमे अता व्योडिट्टा।।। आकांक्षी कामक्रद्धपरिमयना। ई कामोभोगरिमायक लेल न्यायक संचय अछि।। 16-12।

अनुवाद

.. 16.11। ई राक्षसी, जिनका अथाह चिन्ता अछि जे मृत्यु धरि रहैत अछि, आ जे भौतिक सुखकेँ अन्तिम लक्ष्य मानैत छथि, हुनकर दृढ़ मत अछि जे "बस (सत्य, आनंद)"...। 16.12। सैकड़ों आशा सँ बंधे ई लोक, वासना आ क्रोधक चपेट मे, अपन जुनून के संतुष्ट करै लेल अन्यायपूर्ण ढंग सँ धन जमा करय के कोशिश करैत छथि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 13,14,15,16

एहि बेर हम पायब। एहि बेर हम पायब। एहि बेर हम पायब। एहि बेर हम पायब। एहि बेर हमरा फेर भेटत।

अनुवाद

.. 16.13। हमरा आइ ई भेटल अछि आ ई उद्देश्य सेहो भेटत, हमरा लग एते धन अछि आ भविष्य मे आओर धन होयत...। 16.14। "ई शत्रु हमरा द्वारा मारल गेल अछि आ हम अन्य शत्रुकेँ सेहो मारि देब", "हम भगवान आ भोगी छी", "हम सिद्ध पुरुष छी", "हम बलवान आ सुखी छी", ओ कहलक। "... 16.15। "हमर जन्म एकटा धनी आ कुलीन परिवारमे भेल छल। हमरा जकाँ आओर कोन अछि? "", हम यज्ञ करब "", हम दान देब "", हम मौज-मस्ती करब "-एहन अज्ञानता हुनका सभकेँ मोहित करैत अछि...। अनेक प्रकारसँ भ्रमित, भ्रमक जालमे फँसि आ कामुक सुखक प्रति आसक्त, ई लोकसभ घोर, अपवित्र नरकमे पड़ि जाइत छथि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 17

Self-realization: स्थाबधा धनमनमन्दन्विता | याजने नाम याजने यास्ते दम्भेना विधानविता | 16-17 |

अनुवाद

.. 16.17। जे स्वयंकेँ श्रेष्ठ मानैत छथि, जे स्तब्ध (घमण्डी) छथि, जे धन आ सम्मानक अधिकारी छथि, ओ अनुष्ठानसँ रहित मात्र नाममात्रक बलिदानक सङ्ग घमण्डसँ यज्ञ करैत छथि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 18

घमण्ड, शक्ति, कार्य, क्रोध आदि।

अनुवाद

.. 16.18। अहंकार, बल, घमण्ड, वासना आ क्रोधक अधीन ई ईशनिंदा करय वला ओ सभ छथि जे अपन शरीर आ दोसरक शरीर मे हमरा (भगवान) सँ घृणा करैत छथि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 19

तनहम बिसत्ता क्रुरासरसेशु नारदमन। मिस्युम्य जसरास्रमसुभनसूरीश्वेवा योनिशु। 16-19।

अनुवाद

.. 16.19। एहन अपराधी, उत्पीड़क, आ दुर्व्यवहारक कारण हम राक्षसक जननांगमे बार-बार (अजसराम) दुनियामे पड़ैत छी।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 20

असुरी योनिमापन्ना मुधा जन्म जन्म। माम्प्रपय्यव कौन्तेत यन्त्याधमान गतियम। 16-20।

अनुवाद

.. 16.20। ओह प्रिय! ओ सभ मूक पुरुष जननांगमे राक्षसी योनि द्वारा प्राप्त कयल जाइत अछि आ (एहि तरहेँ) हमरा द्वारा नहि अपितु नीच मोती द्वारा प्राप्त कयल जाइत अछि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

श्लोक 21

त्रिगुण नरकस्य द्वारा विनाश ध्यान अछि। कामः क्रोध, लोभ, कामना आदि।

अनुवाद

.. 16.21। वासना, क्रोध आ लोभ आत्म-विनाशक तीन द्वार अछि, तेँ एहि तीनूकेँ त्याग करबाक चाही।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 22

इट्राविमुक्तः कौन्तेय तमोद्वर एस्ट्रविर्नेराः। यति पर गतियाम।। 16-22।

अनुवाद

.. 16.22। ओह प्रिय! नरकक एहि तीन द्वारसँ मुक्त भेल व्यक्ति अपन कल्याणक साधनक अभ्यास करैत अछि आ एहि तरहेँ पारगमन प्राप्त करैत अछि।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 23

धर्मशास्त्रीय अभ्यास जे अछि से क्रिया अछि, पूर्णता नहि, आनन्द नहि, बल्कि गति।

अनुवाद

.. 16.23 जे व्यक्ति धर्मशास्त्रक त्याग करैत अछि आ अपन इच्छासँ प्रेरित भेलाक बाद मात्र काज करैत अछि, ओ न पूर्णता प्राप्त करैत अछि, न सुख आ न पारगमन।

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

श्लोक 24

गवाही आ काजक स्थिति। धर्मशास्त्रक अनुसार काज करबाक ज्ञान राखू। 16-24।

अनुवाद

.. 16.24 एहि लेल धर्मशास्त्र अहाँक लेल कर्तव्य आ कर्तव्यक व्यवस्था (निर्णय) के प्रमाण अछि।

ओम ततसदिति श्रीमद भगवदगीता सुपनिषत्सु ब्रह्मविद्या योगशास्त्र श्रीकृष्णार्जुनसंवदे दैवासुरसम्पदास्वयुगो नाम शोदाशो आरी।

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