दैवासुर सम्पद्भिभागयोग - श्लोक पद 23

दैवासुर सम्पद्भिभागयोग

पद 23

धर्मशास्त्रीय अभ्यास जे अछि से क्रिया अछि, पूर्णता नहि, आनन्द नहि, बल्कि गति।

अनुवाद

.. 16.23 जे व्यक्ति धर्मशास्त्रक त्याग करैत अछि आ अपन इच्छासँ प्रेरित भेलाक बाद मात्र काज करैत अछि, ओ न पूर्णता प्राप्त करैत अछि, न सुख आ न पारगमन।

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