गुणा विभाजन
अथ चतुरदाशो अलारी
पद 22,23,24,25
श्रीभगवानुवच। प्रकाशदी-वृत्तिमोहमेवचपाण्डव। निष्टिश्रर्वृतिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन-वृत्तिन। सर्व-सरमपरिटियागी गुणाटासा। 14-25।
अनुवाद
.. "1 तखन प्रभु कहलथिन", हे प्रभु! (बुद्धिमान व्यक्ति) इजोत, सहज प्रवृत्ति, आवेगसँ घृणा नहि करैत अछि, भले ओ ओकर दिस झुके रहैत अछि, आ जखन ओ सेवानिवृत्त होइत अछि तखन ओकर आकांक्षा नहि करैत अछि...। 14.23। जे व्यक्ति उदासीन जकाँ बसल रहैत अछि ओ गुणसँ विचलित नहि भऽ सकैत अछि आ ई जानि कऽ बसल रहैत अछि जे "गुण व्यवहार करैत अछि" आ ओहि अवस्थासँ विचलित नहि होइत अछि...। 14.24। ओ जे स्वस्थ अछि (रूप मे स्थित अछि), सुख आ दर्द मे बराबर अछि, आ जकर आँख मिट्टी, पत्थर, आ सोनक लेल अछि। एहन वीर व्यक्ति प्रिय आ अप्रिय, आ निन्दा आ आत्म-प्रशंसा समान मानैत छथि...। 14.25। ओ जे सम्मान आ अपमानमे बराबर अछि। शत्रु आ मित्रक पक्षमे सेहो समान, एकरा सर्वमभा परित्यगी पुरुष गुणतिता कहल जाइत अछि।
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