अर्जुन विशायोग - Verse श्लोक 28,29,30,31
श्लोक 28,29,30,31
कृपया पर्यविस्तोक लेल प्रार्थना करू। अर्जुन उत्सव। विश्वयममे सीतम्मा कृष्ण युयुत्सु कोनसालिस्तम। सीताम्मा हमर मुँह आ मुँह धोबै। वेपथुष्ठक शरीर गरम आ शुष्क भऽ जायत। गाँधीवम बाहर आबि जायत। भ्रमराथिवममे मन निकलैत रहत। भ्रमराथिवममे निष्कण्यमस्थममे मन। निमितामे हम विपरीत केश देखब। ना, श्रेयोपाश्यमी हट्वाया सम्पमहावे।
Translation
.. 1. 28। 129. अर्जुन कहलकनि, "हे कृष्ण! हमर अङ्ग-प्रत्यङ्ग शिथिल भऽ गेल अछि, हमर मुँह सुखल रहल अछि, आ युद्धक कामना करय लेल आयल एहि रिश्तेदारसभकेँ देखि हमर शरीर काँपि रहल अछि आ रोमांच भS रहल अछि। 1. 28। 129. अर्जुन कहलकनि, "हे कृष्ण! हमर अङ्ग-प्रत्यङ्ग शिथिल भऽ गेल अछि, हमर मुँह सुखल रहल अछि, आ युद्धक कामना करय लेल आयल एहि रिश्तेदारसभकेँ देखि हमर शरीर काँपि रहल अछि आ रोमांच भS रहल अछि। 1. 30. हमर हाथसँ गाण्डिव (धनुष) खसि रहल अछि आ त्वचा जलि रहल अछि। हमर मन भ्रमित भऽ रहल अछि, आ हम ठाढ़ नहि भऽ सकैत छी...। 1. 31। ओ प्यारी! हम शकुन केँ सेहो उल्टा देखि रहल छी आ युद्ध मे अपन लोक के मारय (होय) मे कोनो फायदा नहि देखैत छी।