भगवद्गीता
मृत्यु पर भगवद्गीता
अध्याय २ में बहुत कुछ सिखाया गया है कि क्या मरता है और क्या नहीं। बाद के अध्यायों में मृत्यु के समय मन की स्थिति के बारे में बताया गया है।
यह स्वयं और शरीर के बारे में शास्त्र है, शोक सलाह या अंतिम संस्कार मार्गदर्शन का विकल्प नहीं है।
विषय-पाठ भाषिणी / IndicTrans2 से अनूदित है। श्लोकार्थ नित्य गीता के मौजूदा भाषा-पाठ से हैं, यंत्र-अनूदित शास्त्र नहीं।
भगवद्गीता 2.20
स्वयं का जन्म नहीं होता और न ही वह मरता है।
।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।
भगवद्गीता 2.22
जैसे-जैसे कोई व्यक्ति पुराने वस्त्रों को फेंक देता है, वैसे-वैसे वह व्यक्ति भी पुराने शरीरों को फेंक देता है।
।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।
भगवद्गीता 2.27
जन्म के लिए मृत्यु निश्चित है, और मृत्यु के लिए जन्म; इसलिए अर्जुन को अपरिहार्य पर शोक न करने के लिए कहा जाता है।
।।2.27।। जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है; इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।
भगवद्गीता 8.5
मृत्यु के समय कृष्ण को याद करने वाले व्यक्ति को कृष्णत्व प्राप्त होता है।
।।8.5।। और जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं।।