भगवद्गीता
भय पर भगवद्गीता
अर्जुन का संकट दुःख से शुरू होता है और युद्ध से पीछे हटता है। इसके बाद का शिक्षण आत्म की प्रकृति और निर्भयता जैसे गुणों को शामिल करता है।
मृत्यु का भय और कर्तव्य का भय दोनों को ध्यान में रखा गया है।
विषय-पाठ भाषिणी / IndicTrans2 से अनूदित है। श्लोकार्थ नित्य गीता के मौजूदा भाषा-पाठ से हैं, यंत्र-अनूदित शास्त्र नहीं।
भगवद्गीता 2.20
शरीर न तो जन्म लेता है और न मरता है, न ही मर जाता है जब शरीर को मार दिया जाता है।
।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।
भगवद्गीता 4.10
बहुतों ने शरण ली है, जुनून, भय और क्रोध से मुक्त हो गए हैं, और कृष्ण के ज्ञान से शुद्ध हो गए हैं।
।।4.10।। राग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञान रुप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।
भगवद्गीता 16.1–3
ईश्वर के गुणों में निर्भयता को भी शामिल किया गया है।
।।16.1।। श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।। ।।16.2।। अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (कोमलता), लज्जा, अचंचलता।। ।।16.3।। हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।
भगवद्गीता 18.66
समापन शरण छंद, अक्सर धर्म में असफल होने के भय के संबंध में पढ़ा जाता है।
।।18.66।। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।