ज्ञानविज्ञानयोग - श्लोक श्लोक 5
ज्ञानविज्ञानयोग
श्लोक 5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् |
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ||७-५||
अनुवाद
।।7.5।। हे महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराप्रकृति को जानो, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।