नित्य गीता
श्रीमद्भगवद्गीता के लिए एक डिजिटल अभयारण्य
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आज का श्लोक
श्लोक 5
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||२-५||
अनुवाद
।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।
अठारह अध्याय
ज्ञान के 18 मार्गों में विभाजित शाश्वत ज्ञान का अन्वेषण करें
गीता ध्यान
8 श्लोक
गीता महात्म्य
8 श्लोक
अर्जुनविषादयोग
46 श्लोक
सांख्ययोग
72 श्लोक
कर्मयोग
43 श्लोक
ज्ञानकर्मसन्यासयोग
42 श्लोक
कर्मसंन्यासयोग
29 श्लोक
ध्यानयोग
47 श्लोक
ज्ञानविज्ञानयोग
30 श्लोक
अक्षरब्रह्मयोग
28 श्लोक
राजविद्या राजगुह्ययोग
34 श्लोक
विभूतियोग
42 श्लोक
विश्वरूपदर्शनयोग
55 श्लोक
भक्तियोग
20 श्लोक
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
35 श्लोक
गुणत्रयविभागयोग
27 श्लोक
पुरुषोत्तमयोग
20 श्लोक
दैवासुरसम्पद्विभागयोग
24 श्लोक
श्रद्धात्रयविभागयोग
28 श्लोक
मोक्षसंन्यासयोग
78 श्लोक
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