सांख्ययोग - श्लोक श्लोक 67

सांख्ययोग

श्लोक 67

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते |

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||२-६७||

अनुवाद

।।2.66।।(संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती। भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती। अशान्त पुरुष को सुख कहाँ?

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