सांख्ययोग - श्लोक श्लोक 68
श्लोक 68
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||२-६८||
अनुवाद
।।2.67।।जल में वायु जैसे नाव को हर लेती है वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का अनुकरण मन करता है, वह एक ही इन्द्रिय इसकी प्रज्ञा को हर लेती है।