सांख्ययोग - श्लोक श्लोक 66

सांख्ययोग

श्लोक 66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |

न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||२-६६||

अनुवाद

।।2.65।।प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।

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