गीता महात्म्य
पद 7
शान्ताकरम भुजगसायनम पद्मनाभम सुरेश विश्वधरम गगनसद्रिशम मेघवर्णा शुभंगम लक्ष्मीकांतम कमलनायनम योगवीर ध्यानगाम्यम वंदे विष्णु च भयहरम सर्वलोकैकनाथ
अनुवाद
हम विष्णुकेँ नमन करैत छी, जे शान्त छथि, सर्पपर विराजमान छथि, जकर नाभिमे कमलक फूल अछि, जे देवताक स्वामी छथि, जे दुनियाक सहारा छथि, जे आकाश जकाँ छथि, जे आकाशक रङ्ग छथि, जकर अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर अछि, जे लक्ष्मीपति छथि, जकर आँखि पद्मनायनक अछि, जे योगीक ध्यानसँ प्राप्त होइत छथि, जे समस्त दुनियाक एकमात्र रक्षक छथि, जे भयकेँ दूर करैत छथि।
श्लोक 8
ब्रह्मा, वरुणेन्द्र, रुद्रमृत, स्थुंवंती, दिव्य, स्थायी, वेद, संगपदक्रम, पानीषादिर, संगम, ध्यान, स्वतंत्रगतेन, मानस, योगिनु, यंत्र, विदु, सूरसुर्गण, देवय, तमस, नमः।
अनुवाद
हम भगवानकेँ नमस्कार करैत छी जिनका ब्रह्मा, वरुण, रुद्र आ वायु दिव्य भजनक सङ्ग स्तुति करैत छथि, जिनका विषयमे समगन वैदिक उपनिषदक वचनक सङ्ग गबैत छथि, जिनका ज्ञानी योगी ध्यानमे पालन करैत छथि, जकर महिमाकेँ देवता आ राक्षस नहि जनैत छथि।
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