राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक पद 8 आ 9

राजविद्या राजगुह्ययोग

पद 8 आ 9

प्रकृति, स्वयंवस्तभ्य, विष्णुजामी, बार-बार। भूतग्रामिम, कृत्तिस्नमवास, प्रकृति, 9-8। ना माँ अपन कर्म धनञ्जयकेँ नियन्त्रित करैत छथि। उध्यासम्वादसिनम् सक्ता, तीसु, कर्मसु। 9-9।

अनुवाद

.. 9. 8. प्रकृतिकेँ वशमे कऽ (अर्थात एकरा चेतना दऽ कऽ) हम एहि सम्पूर्ण भूत समुदायकेँ पुनः निर्माण करैत छी, जे प्रकृतिसँ अधीन भऽ गेल अछि। 9. ओ प्यारी! ओ कर्मकेँ हमरा (भगवान) सँ नहि बाँधैत छथि, जे ओहि कर्मक प्रति आसक्त आ उदासीन छथि।

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