राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक पद 7

राजविद्या राजगुह्ययोग

पद 7

सर्वभूतक कौन्तेय प्रकृति यन्ती मामिकम अछि। कल्पक्षे पुनास्तानी कल्पदावु विसुजाम्यम। 9-7।

अनुवाद

.. 9. 7. ओ प्यारी! (एक) कल्पक अन्तमे, सभ भूत हमर स्वभाव द्वारा प्राप्त होइत अछि। आ (दोसर) कल्पक आरम्भमे हम ओकरा पुनः बनबैत छी।

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