दैवासुरसम्पद्विभागयोग - श्लोक श्लोक 11 और 12

दैवासुरसम्पद्विभागयोग

श्लोक 11 और 12

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः |

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ||१६-११||

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः |

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ||१६-१२||

अनुवाद

।।16.11।। मरणपर्यन्त रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं से ग्रस्त और विषयोपभोग को ही परम लक्ष्य मानने वाले ये आसुरी लोग इस निश्चित मत के होते हैं कि "इतना ही (सत्य, आनन्द) है"।। ।।16.12।। सैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुये, काम और क्रोध के वश में ये लोग विषयभोगों की पूर्ति के लिये अन्यायपूर्वक धन का संग्रह करने के लिये चेष्टा करते हैं।।

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