गुणत्रयविभागयोग - श्लोक श्लोक 5

गुणत्रयविभागयोग

श्लोक 5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः |

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ||१४-५||

अनुवाद

।।14.5।। हे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।।

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