गुणत्रयविभागयोग - श्लोक श्लोक 6

गुणत्रयविभागयोग

श्लोक 6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् |

सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ||१४-६||

अनुवाद

।।14.6।। हे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।

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