अर्जुनविषादयोग - श्लोक श्लोक 35

अर्जुनविषादयोग

श्लोक 35

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||१-३५||

अनुवाद

।।1.35।।हे मधुसूदन ! इनके मुझे मारने पर अथवा त्रैलोक्य के राज्य के लिये भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए कहना ही क्या है।

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