अर्जुनविषादयोग - श्लोक श्लोक 33 और 34
श्लोक 33 और 34
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च |
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||१-३३||
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः |
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ||१-३४||
अनुवाद
।।1.33।।हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादि की इच्छा है, वे ही लोग धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं। ।।1.34।।वे लोग गुरुजन, ताऊ, चाचा, पुत्र, पितामह, श्वसुर, पोते, श्यालक तथा अन्य सम्बन्धी हैं।