मोक्षस्ययोग - श्लोक पद 41
मोक्षस्ययोग
पद 41
ब्राह्मणाक्षत्रियाविश्य शूद्रक प्रान्तप अछि।
अनुवाद
.. 18.41। ओह प्रिय! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्रक कर्मकेँ ओकर स्वभावसँ प्राप्त गुणक अनुसार विभाजित कयल जाइत अछि।
ब्राह्मणाक्षत्रियाविश्य शूद्रक प्रान्तप अछि।
.. 18.41। ओह प्रिय! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्रक कर्मकेँ ओकर स्वभावसँ प्राप्त गुणक अनुसार विभाजित कयल जाइत अछि।
पवित्र श्लोककेँ दुनियाक सङ्ग साझा करबाक लेल सुन्दर, सिनेमाई वीडियोमे बदलि दियौक। अपन पृष्ठभूमि चुनू, मंत्र ऑडियो जोड़ू, आ आधुनिक प्रारूपमे गीताक प्रकाशकेँ फैलाउ।
एहि सुविधासभ लेल ऐप डाउनलोड करू
नित्य गीताक पूर्ण संस्करणक सङ्ग सिनेमाई आध्यात्मिक यात्राक शुरुआत करू। उच्च गुणवत्ता वाला मंत्र, प्रामाणिक अनुवाद, आ अपन हाथ के हथेली मे एक शांतिपूर्ण ध्यान अभयारण्य।
अहाँक योगदान हमरा सभकेँ गीताक ज्ञान सभकेँ, सर्वत्र उपलब्ध कराबयमे मदति करैत अछि।
कोनो यूपीआई ऐपसँ स्कैन करू
जी. पी. ए., फोनपे, पेटीएम, आदि