भगवद्गीता
अनुशासन और अभ्यास पर भगवद्गीता
यहां अनुशासन योग और अभ्यसा से ज्यादा कठोर आत्म-शिक्षा से निकट है। गीता में जोर दिया गया है कि मन कठिन है, और फिर भी प्रशिक्षित किया जा सकता है।
ये श्लोक अभ्यास का मार्ग मानते हैं। वे उत्पादकता हैक नहीं हैं।
विषय-पाठ भाषिणी / IndicTrans2 से अनूदित है। श्लोकार्थ नित्य गीता के मौजूदा भाषा-पाठ से हैं, यंत्र-अनूदित शास्त्र नहीं।
भगवद्गीता 6.5
एक व्यक्ति को स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए और स्वयं को अवमूल्यन नहीं करना चाहिए।
।।6.5।। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।
भगवद्गीता 6.6
स्वयं एक मित्र या शत्रु है, इस पर निर्भर करता है कि उसे प्रभुत्व प्राप्त हुआ है या नहीं।
।।6.6।। जिसने आत्मा (इंद्रियों,आदि) को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उस पुरुष का आत्मा उसका मित्र होता है, परन्तु अजितेन्द्रिय के लिए आत्मा शत्रु के समान स्थित होता है।।
भगवद्गीता 6.26
जहां भी बेचैन मन भटकता है, उसे नियंत्रण में लाया जाना चाहिए।
।।6.26।। यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे।।
भगवद्गीता 6.35
मन बेचैन है, लेकिन अभ्यास और उदासीनता से उसे रोक दिया जाता है।
।।6.35।। श्रीभगवान् कहते हैं -- हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।