भगवद्गीता
भगवद् गीता मन में
अर्जुन कहते हैं कि मन को नियंत्रित करना हवा की तरह कठिन है। कृष्ण सहमत हैं और अभी भी अभ्यास सिखाते हैं।
ये श्लोक गीता की योग शब्दावली में मन का वर्णन करते हैं, समकालीन तंत्रिका विज्ञान में नहीं।
विषय-पाठ भाषिणी / IndicTrans2 से अनूदित है। श्लोकार्थ नित्य गीता के मौजूदा भाषा-पाठ से हैं, यंत्र-अनूदित शास्त्र नहीं।
भगवद्गीता 6.5
अपने आप को ऊपर उठाएं।
।।6.5।। मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।
भगवद्गीता 6.6
खुद को दोस्त या दुश्मन के रूप में।
।।6.6।। जिसने आत्मा (इंद्रियों,आदि) को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उस पुरुष का आत्मा उसका मित्र होता है, परन्तु अजितेन्द्रिय के लिए आत्मा शत्रु के समान स्थित होता है।।
भगवद्गीता 6.26
भटकते मन को वापस लाओ।
।।6.26।। यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे।।
भगवद्गीता 6.34
अर्जुन का विरोधः मन बेचैन, अस्थिर, शक्तिशाली और जिद्दी है।
।।6.34।। क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह करना मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ ।।
भगवद्गीता 6.35
कृष्णा का उत्तरः अभ्यास और उदासीनता।
।।6.35।। श्रीभगवान् कहते हैं -- हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।