भगवद्गीता
सफलता और कार्य में दक्षता पर भगवद्गीता
जहां आधुनिक शोधकर्ता सफलता के बारे में पूछते हैं, गीता योग, कौशल और एक मन के बारे में बात करती है जो लाभ के दास नहीं है।
इस ग्रंथ में समृद्धि का सूत्र नहीं दिया गया है, बल्कि सफलता को फल से कार्य और समझ की गुणवत्ता पर स्थानांतरित कर दिया गया है।
विषय-पाठ भाषिणी / IndicTrans2 से अनूदित है। श्लोकार्थ नित्य गीता के मौजूदा भाषा-पाठ से हैं, यंत्र-अनूदित शास्त्र नहीं।
भगवद्गीता 2.47
फल का दावा किए बिना कार्य के बारे में सबसे अधिक उद्धृत पद।
।।2.47।। कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।
भगवद्गीता 2.50
योग को क्रिया में कौशल कहते हैं।
।।2.49।।इस बुद्धियोग की तुलना में (सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं। इसलिये हे धनंजय ! तुम बुद्धि की शरण लो; फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।
भगवद्गीता 6.1
योग को त्यागने के बजाय आवश्यक कार्य करने से जोड़ता है।
।।6.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है।।
भगवद्गीता 18.46
सभी प्राणियों के स्रोत की उपासना के साथ काम को जोड़ता है।
।।18.46।। जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।