भगवद्गीता
कर्म योग पर भगवद्गीता
कर्म योग गीता के केंद्रीय मार्गों में से एक हैः कार्य करें, लेकिन फल को आपको बांधने न दें।
अध्याय 3 को पारंपरिक कोलोफोन में कर्म योग कहा जाता है। इससे जुड़ी शिक्षा पहले से ही अध्याय 2 में दिखाई दे रही है।
विषय-पाठ भाषिणी / IndicTrans2 से अनूदित है। श्लोकार्थ नित्य गीता के मौजूदा भाषा-पाठ से हैं, यंत्र-अनूदित शास्त्र नहीं।
भगवद्गीता 2.47
फल के लिए दावा के बिना कार्रवाई के लिए बीज-पद्य।
।।2.47।। कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।
भगवद्गीता 3.9
बलिदान (yajña) के रूप में किए गए कार्य को छोड़कर दुनिया कार्य से बंधी है।
।।3.9।। यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।
भगवद्गीता 3.19
निष्क्रिय होकर, वह कार्य करें जो किया जाना है।
।।3.19।। इसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है।।
भगवद्गीता 3.30
हर कार्य को कृष्णा को समर्पित करें, मन को स्वयं पर केंद्रित करें, आशा या स्वामित्व के बिना।
।।3.30।। सम्पूर्ण कर्मों का मुझ में संन्यास करके, आशा और ममता से रहित होकर, संतापरहित हुए तुम युद्ध करो।।