क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग - श्लोक श्लोक 13

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

श्लोक 13

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते |

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ||१३-१३||

अनुवाद

।।13.13।। मैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

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