राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक पद 31

राजविद्या राजगुह्ययोग

पद 31

कौन्ते प्रतिजानीही ना मे भक्तः प्रणश्यती।। 9-31।।

अनुवाद

.. 9. 31. शीघ्रहि, हे कौन्तेया, ओ धर्मात्मा बनि जाइत अछि आ अनन्त शान्ति प्राप्त करैत अछि। अहाँ निश्चित रूपसँ जनैत छी जे हमर भक्तक कदापि नाश नहि होइत अछि।

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