ज्ञानकर्मस्योग - श्लोक पद 20

ज्ञानकर्मस्योग

पद 20

तथागत्व कर्मफलसंग नित्य-तुश्रुत-निश्रया। कर्मण्य-भी-प्रवृत सेहो निष्कपट किश्तकारिता-सा छथि। 4-20।

अनुवाद

.. 4. 20. जे व्यक्ति कर्मक फल छोड़ि अनन्त काल धरि सन्तुष्ट रहैत अछि आ कोनो आश्रयसँ रहित रहैत अछि, ओ कर्ममे लागल रहैत (वास्तवमे) किछु नहि करैत अछि।

मात्र पढ़बासँ बेसी -
अपन ध्यान वीडियो बनाउ।

पवित्र श्लोककेँ दुनियाक सङ्ग साझा करबाक लेल सुन्दर, सिनेमाई वीडियोमे बदलि दियौक। अपन पृष्ठभूमि चुनू, मंत्र ऑडियो जोड़ू, आ आधुनिक प्रारूपमे गीताक प्रकाशकेँ फैलाउ।

एहि सुविधासभ लेल ऐप डाउनलोड करू

  • उच्च गुणवत्ता वाला पृष्ठभूमि कलाकृति
  • संस्कृत आ अर्थ पाठकेँ समन्वित कयल गेल
  • इमर्सिव चैन्टिंग आ संगीत
Video Generation Preview

गहन विसर्जनक अनुभव करू

नित्य गीताक पूर्ण संस्करणक सङ्ग सिनेमाई आध्यात्मिक यात्राक शुरुआत करू। उच्च गुणवत्ता वाला मंत्र, प्रामाणिक अनुवाद, आ अपन हाथ के हथेली मे एक शांतिपूर्ण ध्यान अभयारण्य।