श्रद्धात्रय विभायोग - श्लोक पद 2

श्रद्धात्रय विभायोग

पद 2

श्रीभगवानूचचा। त्रिविदयाश्ररधिनिनास प्रजाज। सात्विकी राजस्य-स्व-तमसिचेट्टाज। 17-2।

श्रीभगवानुवाच

अनुवाद

.. 17. 2. पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कहलनि, "शरीर-वाहक (मनुष्य) सभक स्वाभाविक (अज्ञानी) श्रद्धा तीन प्रकारक होइत अछि-सात्त्विक, राजसिक आ तामसिक-हमरा सँ सुनि लिअ।"

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