राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक श्लोक 33

राजविद्या राजगुह्ययोग

श्लोक 33

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा |

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ||९-३३||

अनुवाद

।।9.33।। फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।

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