राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक श्लोक 23
राजविद्या राजगुह्ययोग
श्लोक 23
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः |
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ||९-२३||
अनुवाद
।।9.23।। हे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।