राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक श्लोक 18

राजविद्या राजगुह्ययोग

श्लोक 18

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् |

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ||९-१८||

अनुवाद

।।9.18।। गति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।

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