अक्षरब्रह्मयोग - श्लोक श्लोक 6

अक्षरब्रह्मयोग

श्लोक 6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ||८-६||

अनुवाद

।।8.6।। हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।

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