अक्षरब्रह्मयोग - श्लोक श्लोक 25

अक्षरब्रह्मयोग

श्लोक 25

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् |

तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ||८-२५||

अनुवाद

।।8.25।। धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास वाले मार्ग से चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त कर, योगी (संसार को) लौटता है।।

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