सांख्ययोग - श्लोक श्लोक 22

सांख्ययोग

श्लोक 22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्यन्यानि संयाति नवानि देही ||२-२२||

अनुवाद

।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।

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