मोक्षसंन्यासयोग - श्लोक श्लोक 47

मोक्षसंन्यासयोग

श्लोक 47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||१८-४७||

अनुवाद

।।18.47।। सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

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