मोक्षसंन्यासयोग - श्लोक श्लोक 29
श्लोक 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु |
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ||१८-२९||
अनुवाद
।।18.29।। हे धनंजय ! मेरे द्वारा अशेषत: और पृथकत: कहे जाने वाले, गुणों के कारण उत्पन्न हुए बुद्धि और धृति के त्रिविध भेद को सुनो।।