पुरुषोत्तमयोग - श्लोक श्लोक 5

पुरुषोत्तमयोग

श्लोक 5

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा

अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः |

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्-

गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ||१५-५||

अनुवाद

।।15.5।। जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।।

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