राजविद्या राजगुह्ययोग - श्लोक पद 5

राजविद्या राजगुह्ययोग

पद 5

मातस्थ के भूत के दृष्टि मे सेहो नहि, योगमैस्वरम। भूतभिरन्ना, भूतस्तो, ममात्मा, भूतभवन। 9-5।

अनुवाद

.. 9. 5। आ (वास्तवमे) हमरा मे मात्र भूत नहि अछि। हमर दिव्य योगकेँ देखू जे हमर आत्मा, जे भूत धारण करैत अछि आ भूत उत्पन्न करैत अछि, ओहि भूतमे स्थित नहि अछि।

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