ध्यान - श्लोक श्लोक 4

ध्यान

श्लोक 4

सर्वसंकल्पकेँ सन्यासी योगरुद्ध कहल जाइत अछि जखन इन्द्रियमे कोनो क्रिया नहि होइत अछि। 6-4।

अनुवाद

.. 4. जखन (साधक) न इन्द्रियाक वस्तुक प्रति आसक्त होइत अछि आ न कर्मक प्रति, तखन सभ इच्छाक तपस्वीकेँ योगरुद्ध कहल जाइत अछि।

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