गणना - श्लोक पद 55
गणना
पद 55
श्रीभगवानूचनववचता। प्रजाहतीवकमास्वरवनार्थ मनोगितानयनवय आत्मान्यवत्मानुतुपस्त। 2-55।
श्रीभगवानुवाच
अनुवाद
.. 2.55। भगवान कहलकनि, "हे पार्थ? मनुष्य कखन मन के सब इच्छा छोड़ैत अछि आ आत्मा द्वारा आत्मा सँ संतुष्ट होइत अछि? ओहि समयमे एकरा स्थितप्रज्ञा कहल जाइत छल।