गणना - श्लोक श्लोक 15
गणना
श्लोक 15
एकर अभावमे पुरुष बनि जाइत छथि।
अनुवाद
.. 2. 15. ऐ मानव जाति! जे धैर्य दुःख आ सुखमे समान रूपसँ रहैत अछि आ एहि सभसँ विचलित नहि भऽ सकैत अछि, ओ अमृतत्व (मोक्ष) के स्वामी छथि।
एकर अभावमे पुरुष बनि जाइत छथि।
.. 2. 15. ऐ मानव जाति! जे धैर्य दुःख आ सुखमे समान रूपसँ रहैत अछि आ एहि सभसँ विचलित नहि भऽ सकैत अछि, ओ अमृतत्व (मोक्ष) के स्वामी छथि।
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